पशु-पंछियों को भी भाव-भावनाएं होती हैं-डॉ.विजय शिंदे

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मनुष्य सजीव प्राणी है बुद्धि के बलबूते पर दूसरों के दिलों-दिमाग को समझना और कल्पना करने की अद्भुत क्षमता मनुष्य में है। शोक, प्रेम, हास, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय, रौद्र, और शांत मनुष्य स्वभाव की भाव-भावनाएं होती हैं। अलग-अलग स्थितियों में इन भावों का प्रमाण कम-अधिक रहता है। पशु-पंछी मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी तो है नहीं परंतु भाव-भावनाएं जरूर होती है....
            अजय घर में पालतू बिल्ली के साथ घुल-मिल गया था। उसके रेशम जैसे बाल, लाल-गुलाबी होंठ, लंबी मूछें, रात के अंधेरे में चमकती आंखें, लंबी पूंछ औरम्यावअजय के मनोरंजन का साधन थी। अजय हमेशा प्यारी बिल्ली के साथ खेला करता था। परंतु जाने-अनजाने उससे बिल्ली के साथ ज्यादतियां हो रही थी। बिल्ली की लंबी मूछों को खिंचना, पूंछ पकड़कर बिल्ली को उठाना, लाठी लेकर उसके पीछे दौड़ना और उसे चोट पहुंचा कर उसकी     म्याव सुनना उसका शौक बना था।
            बेचारी बिल्ली अजय की इन हरकतों से परेशान होकर दूर भागती थी। कभी-कभार दौड़ कर अल्मारी में छिप जाती। अजय के मम्मी के गोद में म्यावकरके शिकायत भी करती।
            मां ने अजय को बार-बार समझाया, "बेटा अजय बिल्ली बोल तो नहीं सकती, परंतु तुम्हारी हरकतों से उसे पीडा होती है, चोट पहुंचती है, तुम जरा उसके साथ प्यार से पेश आओ।"
            अजय शरारती था। मम्मी क्या बता रही है और बिल्ली को  कौन-सी परेशानियां हो रही हैं, समझ नहीं रहा था। ऐसे ही एक दिन अजय ने बिल्ली की पूंछ पकड़ कर ऊपर उठाया, घुमाया। परेशान करना शुरू किया केवल म्यावसुनने के लिए।
            अजय की मम्मी ने अजय की इस हरकत को देखा और सोचा कि इसे पाठ पढाना जरुरी है। अजय के हाथों से बिल्ली जब छिटकर भागी तब मम्मी ने अजय को लपक कर पकड लिया। पैरों को पकड़ कर कई बार ऊपर उठाया। परेशान किया, हवा में घुमाया। अजय का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। आंखें लाल हो गई, पैर दर्द करने लगे। एक बार सर दीवार पर टकराकर खून भी बहने लगा।
            अजय के पीडाओं की सीमाएं खत्म हो गई। बेहाल होकर उसने मम्मी को कहा, "तुमने बेवजह मुझे परेशान किया है। मैं पापा के पास तुम्हारी शिकायत करूंगा।"
            मम्मी बोली, "बेटा, मैं भी तुम्हें कई दिनों से यहीं समझा रही थी। तुम्हारे पास मम्मी पापा है। पर इस बेचारी के पास कोई है नहीं, किसके पास शिकायत करेगी ? तुम्हें जैसे दुःख, दर्द, डर-भय लगा, खून आया उसी तरिके से बिल्ली को रोज लगता है। पशु-पंछियों को भी भाव-भावनाएं होती हैं।"
            अचानक अजय के दिमाग में मानो प्रकाश पड़ गया और उसने मां से क्षमा मांगी। किचन में जाकर दूध कटोरी में भर कर बिल्ली को दे दिया और उसके मुलायम माथे पर हाथ फेरते कहा, "अब मैं तुम्हें परेशान नहीं करूंगा, पशु-पंछियों को भी दुःख-दर्द होता है, उनकी भी भाव-भावनाएं होती है।"

                               डॉ.विजय शिंदे
                          देवगिरी महाविद्यालय,औरंगाबाद (महाराष्ट्र)
                             -मेल drvtshinde.blogspot.com


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